जुड़ते हैं कईं नाते, रोज़ यहाँ नये-नये ...

Posted By सोनिया सिरसाट | 05 October 2013 21:42 IST

जुड़ते हैं कईं नाते, रोज़ यहाँ नये-नये ।

खुलते हैं दुनियादारी के खाते, रोज़ यहाँ नये-नये ।।

 

न होता है इल्म इनके खुलने का, न बंद होने का कोई अंदाज़ा ।

तय किये जाते हैं सफर अनजाने, रोज़ यहाँ नये-नये ।।

 

चढ़ते रहते हैं चेहरों पर रंग, रोज़ यहाँ नये-नये ।

लिखे जाते हैं बग़ावत के बहीखाते, रोज़ यहाँ नये-नये ।।

 

छोडे जाते हैं ऐसे असर कि सब कुछ हो जाता है बेअसर ।

दोहराये जाते हैं किस्से पुराने, सिर्फ अंदाज़ होते हैं नये-नये ।।

 

जुड़ते हैं कईं नाते, रोज़ यहाँ नये-नये ।

खुलते हैं दुनियादारी के खाते, रोज़ यहाँ नये-नये ।।

 

 

 

 

 

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Previous Comments

Thank you so much for your inspiring words Dev.

- Dr. Soniya Sirsat, Parra | 13 th September 2015 11:12

 

Nice and it's reality

- dev javir, borim | 09 th September 2015 22:52

 

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